इक नया दिन आ गया,
ये नई एक सुबह है
जो कल ढला था शाम की चादर में,
वह सूरज आज लौटा नहीं।
मगर उजाला आज साफ-साफ है
कोई तो आया ही होगा
चौराहे पर वो लोग तड़के,
तुझे सूरज ही कह गए...
एक नई उमंग हो तुम,
जैसे सर्द हवाओं में
कोई गर्म साँस देके मेरी
ठंडी हथेली में जान फूँकता हो...
ऐसी पाक आखें तेरी-
जैसे तपते आसमाँ के तले,
इक विशाल वृक्ष
बैठाए हो किसी मासूम के
टूटे नन्हें बदन को -
शीतल छाँव-सी मिलती है इनमे....
किसी हीरे से तो बने हो,
कि मेरी ज़िंदगी की रात में
तारे से चमकते हुए,
कभी झिलमिल, कभी ओझल,
तुम इतनी दूर से मेरे संग-संग,
कर रहे हो तय
ये मेरा मुश्किल सफर,
पर है मुझको खबर।
तुम्हारे जिगर से रौशनी की एक डोर
इस जहाँ तक आती है
मेरे मन को वो छू जाती है
कुछ इस तरह, के जैसे झूम के गिरती है
बारिश की वो मदहोश बूँद
पत्तियों की गोद में...
ये देखते ही देखते
मुझे यकीन-सा होने लगा है
मेरे ही बनाये इस ख्यालों के जहाँ में,
संभाल के ज़रा रखना
ये मेरा काँच सा सपना
तुम्ही ने जो सजाया है
तुम्हारे पास है गिरवी रखा
मेरी इस जान के बदले।
I'm writing easy..Guess you'd have to take it easy. Don't leave those irrelevant nasty comments. Relevant-nasty should be fine :) Chuck all of that...just have fun!
Tuesday, December 11, 2007
Posted by
Shilpa
at
2:40 PM
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